
*आईआरआरआई के निदेशक ने कृषि विज्ञान केन्द्र एवं कृषि महाविद्यालय कोटवा का किया भ्रम
अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, फिलिपींस के दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय केन्द्र, वाराणसी के निदेशक डॉक्टर सुधांशु सिंह ने आचार्य नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के अधीन संचालित कृषि विज्ञान केन्द्र एवं कृषि महाविद्यालय कोटवा का भ्रमण किया।
उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान द्वारा किसानों के हितार्थ किए जा रहे विभिन्न क्रियाकलापों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया की उनका संस्थान हरित क्रांति में उल्लेखनीय योगदान देते हुए आज तक लगातार पूरी दुनिया की खाद्य सुरक्षा से लेकर किसानों की आर्थिक समृद्धि की दिशा में निरंतर कार्य कर रहा है।
दुनिया की लगभग 60 प्रतिशत और भारत की लगभग 50 प्रतिशत चावल की प्रजातियों के विकास में इस संस्थान का विशेष योगदान रहा है। जलवायु अनुकूल प्रजातियों के विकास में संस्थान ने विशिष्ट कार्य किया है। प्राकृतिक आपदा जैसे बाढ़ सूखा आदि प्रतिकूल परिस्थिति में भी किसानों को अच्छा उत्पादन मिल सके ऐसी प्रजातियों जैसे स्वर्णा सब -1, सम्भा सब -1 आदि का विकास किया गया है। साथ ही यह तकनीकी विभिन्न संस्थानों के माध्यम से किसानों तक पहुंचने का प्रयास कर रहा है।
उन्होंने बताया कि आज भले ही हमारा देश खाद्यान के मामले में आत्मनिर्भर हो चुका है परंतु हमारे भोजन में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी परिलक्षित हो रही है जिससे कई तरह की बीमारी का सामना करना पड़ रहा है। संस्थान द्वारा इस दिशा में प्रयास करते हुए बायोफोर्टिफायड किस्मों का विकास किया जा रहा है जिसमें जिंक, लोहा आदि सूक्ष्म तत्वों की अधिकता हो।
भारत की स्थानीय किस्मों के संरक्षण हेतु भी प्रयास किये जा रहें हैं। काला नमक जो अपनी सुगंध और गुणवत्ता के कारण प्राचीन काल से प्रसिद्ध है तथा महात्मा बुद्ध के प्रसाद के रूप में जाना जाता है उस पर भी संस्थान द्वारा काम किया जा रहा है। ढेर सारी किस्मों का परीक्षण करके उत्कृष्ट किस्मों का चयन और विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में उनका परीक्षण किया जा रहा है। काला व काला नमक चावल के निर्यात के स्थान पर उसके विभिन्न मूल्य वर्धित उत्पाद जैसे बिस्किट, चाकलेट आदि बनाकर विदेशों में निर्यात करने हेतु विभिन्न संस्थान व किसान उत्पादक संगठनों से समन्वय कर सहयोग लिया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि संस्थान द्वारा चावल की ऐसी किस्मों का विकास किया जा रहा जिनका ग्लाइसीमिक इंडेक्स कम हो, ऐसी प्रजाति मधुमेह (डायबेटीज) के रोगियों के लिए वरदान साबित होगी।
भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार के सहयोग से वर्ड बैंक जैसी संस्था के वित्तपोषण से संस्थान द्वारा चावल अनुसंधान को बढ़ाने व किसानों की आर्थिक समृद्धि हेतु कई परियोजनाओं पर कार्य किया जा रहा है जिनमें यू पी एग्री प्रमुख है।
इसके साथ ही पर्यावरण संरक्षण, खेती में लागत कम करने एवं टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने के लिए कृषि विज्ञान केन्द्र एवं विभिन्न संस्थानों के सहयोग से धान की सीधी बोआई, कार्बन क्रेडिट, ड्रोन व अर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का कृषि में अनुप्रयोग आदि तकनीकी क्षेत्रों में भी संस्थान द्वारा कार्य करने की जानकारी दी।
अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (आईआरआरआई) और भारत गणराज्य ने उत्तर प्रदेश के वाराणसी में आईआरआरआई दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र (आईएसएआरसी) की स्थापना करके अपनी 56 साल की साझेदारी में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। 29 दिसंबर 2018 को, भारत के प्रधान मंत्री महामहिम श्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय चावल किसानों की आय को दोगुना करने के लिए इस अत्याधुनिक चावल अनुसंधान सुविधा का आधिकारिक रूप से उद्घाटन किया। राष्ट्रीय बीज अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केन्द्र (एनएसआरटीसी) के परिसर में स्थित आईएसएआरसी, फिलीपींस में अपने मुख्यालय से आगे आईआरआरआई के महत्वपूर्ण विस्तार का प्रतीक है।
ISARC क्षेत्र में अनुसंधान साझेदारी को बढ़ावा देने के लिए एक केंद्रीय केंद्र के रूप में कार्य करता है। यह केंद्र विभिन्न संस्थानों, वैज्ञानिकों और अन्य हितधारकों को प्रशिक्षण और सेवाएं प्रदान करता है। भारत के कृषि और किसान कल्याण विभाग (DoA&FW) और IRRI के बीच समझौता ज्ञापन के माध्यम से स्थापित, ISARC की पहुंच दक्षिण एशिया और अफ्रीका के अन्य देशों तक फैली हुई है।
आईआरआरआई को एक अंतरराष्ट्रीय संगठन के रूप में मान्यता देते हुए, भारत सरकार ने 04 अक्टूबर 2017 को एक राजपत्र अधिसूचना के माध्यम से, संस्थान को संयुक्त राष्ट्र विशेषाधिकार और प्रतिरक्षा अधिनियम 1947 के अनुसार विशेषाधिकार और प्रतिरक्षा प्रदान की। ये विशेषाधिकार और प्रतिरक्षा आईएसएआरसी सहित भारत में आईआरआरआई के सभी कार्यालयों और गतिविधियों तक विस्तारित हैं।
केवीके के प्रभारी डॉ डी के सिंह ने बताया कि संस्थान के तकनीकी दिशा निर्देशन में कृषि विज्ञान केन्द्र कोटवा द्वारा 50 एकड़ से अधिक क्षेत्रफल में किसानों के प्रक्षेत्र पर मशीन द्वारा धान की सीधी बोआई कराई गई है।
वरिष्ठ वैज्ञानिक व परियोजना अन्वेषक डॉ रुद्र प्रताप सिंह ने धान की सीधी बोआई को पर्यावरण अनुकूल व किसान हितैषी बताया। वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ रणधीर नायक ने भी केन्द्र द्वारा कराये जा रहे कार्यों की जानकारी साझा की।