
पुस्तक चर्चा -दिलीप दीपक
पिछले वर्ष डॉ निरंजन की प्रकाशित आलोचनात्मक पुस्तक ‘कबीर की विरासत’ कबीर और उनके साहित्य को समझने की एक ऐसी दृष्टि प्रदान करती है जिससे तटस्थ एवं तन्मय होकर कबीर साहित्य का रसास्वादन किया जा सके। संभवत: इसका कारण उनका अध्यापकीय व्यक्तित्व है। जो कबीर साहित्य को पढ़ते समय पाठक के मन में उत्पन्न होने वाली दुविधाओं का सहज समाधान कर देता है। ज्यों सूर्य बादलों की ओट से निकल अपनी पूर्ण आभा में शरद ऋतु की शीतलता से आराम दे रहा हो । डॉक्टर निरंजन कबीर की विरासत नामक लेख में घोषणा करते हैं कि-” कबीर ऐसे ही कवि हैं। जिनकी रचना कविता भी है और अपने समय का समाजशास्त्र भी। कबीर कवि भी हैं उपदेश भी हैं। धर्मवेत्ता भी हैं और समाज सुधारक भी हैं।वह संत भी हैं और गृहस्थ भी। वह अनन्य प्रेमी भी और वैरागी भी”।
कबीर के समान ही अस्वीकारता का भाव डाॅ० निरंजन में भी है। वे भी वर्तमान दौर में मानवीय मूल्यों में आ रही गिरावट से चिंतित और कुछ हद तक निराश हैं । यहां पर आलोचक और कवि की मन:स्थिति लगभग एक समान हो जाती है । तभी तो डॉक्टर निरंजन लिखते हैं कि “आज के समय की सबसे निर्मम सच्चाई यह है कि कुछ कर सकने का समर्थ रखने वाले लोग आत्म केंद्रित होते जा रहे हैं। उनमें घर जोड़ने की माया प्रबल होती जा रही है अपने लिए अपने परिवार के लिए अपने लोगों के लिए क्या कुछ पाने तथा क्या कुछ करने की ललक मनुष्य को भाई भतीजावाद की ओर धकेल दिया है। कुछ ज्यादा उदार हुए तो अपनी जाति के लिए। बस इन्हीं के लिए हमारी संवेदना सीमित है…….. अधिक से अधिक धन संग्रह की प्रवृत्ति ने मनुष्य को लोभी और अवसरवादी बना दिया है। सारे के सारे घोटालों के पीछे मात्र एक यही कारण है। उन सबको अनपढ़ कबीर से शिक्षा लेने की आवश्यकता है” (पृष्ठ-46)।
आगे डॉक्टर निरंजन कबीर की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए कबीर के समय और वर्तमान दौर में एक समानता और चुनौती देख रहे हैं। जैसे कबीर के समय में अपनी बात कहने की छूट नहीं थी। सत्ता के समक्ष हां में हां मिलाने वालों की ही खैर थी।ऐसे में कबीर ने अस्वीकार का साहस दिखाया। ऐसी स्थिति वर्तमान में भी है और कुछ लेखक कबीर के समान ही अस्वीकार करने का साहस दिखा रहे हैं।यथा-“आज के वैज्ञानिक युग में भी सत्य कहने (यानी सत्ता के खिलाफ) या कुछ करने पर फतवे जारी होते हैं। सलमान रुश्दी, तस्लीमा नसरीन, सानिया मिर्जा,डॉक्टर विनायक सेन, वृंदा करात आदि को अपनी बात कहने पर फतवे या निर्वासन का दंड मिलता है और उनका विरोध करने वालों को पुलिस की लाठियां और जेल मिलते हैं। इतने से तो स्पष्ट हो जाता है कि लगभग वे सभी समस्याएं आज भी प्रत्यक्ष-परोक्ष या बदले हुए रूप में मौजूद हैं। फर्क सिर्फ समय और समाधान का है” (पृष्ठ-46)।
डॉ निरंजन केवल आलोचना के लिए आलोचना नहीं करते हैं। न ही प्रिय कवि होने भर से उसके काव्य कर्म का यशोगान करने लगते हैं बल्कि कवि के साहित्य में कविता कितनी है। इसकी सजग एवं गहन पड़ताल करते हैं तभी तो अध्यापकीय जीवन में होते हुए। कबीर को कक्षाओं में कवि की हैसियत से पढ़ने और पढ़ते हुए भी “कबीर की रचना कितनी कविता है? किस ढंग की कविता है? यह प्रश्न उनके मन में है। साथ ही यह चिंता भी की आलोचकों का एक वर्ग कबीर के क्रांतिकारी विचारों को आधार बनाकर उन्हें अधार्मिक घोषित करने पर तुले हुए हैं”( पृष्ठ-11)
वे चिंतित है कि सगुन बनाम निर्गुण की भांति ही कबीर बनाम तुलसी करने एवं तुलसी को धार्मिक व कबीर को अधार्मिक सिद्ध करने में वे अपनी संपूर्ण ऊर्जा लगा रहे हैं। उनका मानना है कि हम कबीर को उनके सामाजिक एवं धार्मिक रूप से अलगा नहीं सकते। इसको अलगाने से हम कबीर को पूरेपन के साथ नहीं समझ सकते। सम्भवतः डॉ निरंजन यहां पर कहना चाहते हैं कि “हमें अपने-अपने कबीर ढूंढने की बजाय सबके कबीर को ढूंढना चाहिए वह भी पूरेपन के साथ।
डॉ० निरंजन का मानना है कि कबीर का व्यक्तित्व धार्मिक है। लेकिन मौजूदा समाज में जो धर्म का रूप है वह उन्हें मंजूर नहीं है। ईश्वर के नाम पर जो व्यापार चल रहा है वह उसके सबसे प्रखर आलोचक हैं। लेकिन आलोचक होने से उन्हें अधार्मिक नहीं कह सकते हैं…….. पुरुषोत्तम अग्रवाल के शब्दों में कहें तो कबीर धर्मेत्तर अध्यात्म के जनक हैं।
डॉ० निरंजन वर्तमान कवियों की आत्ममुग्धता पर व्यंग्य करते हुए भक्ति काल के कवियों का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि जायसी को छोड़कर किसी ने स्वयं को कवि नहीं कहा है। जबकि वर्तमान में सभी अपने को सिद्ध, दक्ष और महान मानते हैं। स्वयं अपनी प्रशंसा बघारते रहते हैं। कुछ ऐसे ही आज कवि बनने की होड़ में लोग कर रहे हैं। सभी अपने को कवि सिद्ध करने में लगे हुए हैं। एक कविता क्या छपी हर जगह चर्चा करते मिल जाते हैं। उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि हिंदी साहित्य में जिस युग को स्वर्ण काल कहा जाता है। उस युग का कोई भी रचनाकार अपने को कवि नहीं कहता, सिर्फ जायसी को छोड़कर (पृष्ठ-45)।
दिलीप दीपक